नई दिल्ली। कोरोना की दूसरी लहर के बीच अब लोगों को ब्लैक फंगस का डर सताने लगा है. देशभर में ब्लैक फंगस के मामले लगातार सामने आ रहे हैं. उत्तर प्रदेश में ब्लैक फंगस को महामारी भी घोषित कर दिया गया है. शुरुआती दौर में ब्लैक फंगस की मुख्य वजह स्टेरॉयड बताई गई, लेकिन कुछ विषेशज्ञ इस बीमारी की कुछ और ही वजह बता रहे हैं.
दरअसल, कोविड19 की पहले लहर में शुगर के काफी मरीज इसके चपेट में आ गए थे. वे काफी समय तक ICU में भी भर्ती रहे, इस दौरान उनको स्टेरॉयड की डोज भी दी गई. लेकिन, उस समय तक ब्लैक फंगस फैला नहीं था.
इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन भी हो सकता है कारण
ब्लैक फंगस के बढ़ते मामलों के बीच एम्स की डॉक्टर प्रोफेसर उमा कुमार ने सवाल उठाते हुए कहा कि कोरोना मरीजों को मेडिकल ऑक्सीजन की जगह इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन दिए जाने की वजह से मामले बढ़ रहे हैं.उन्होंने कहा कि ह्यूमिडिफायर में स्टेरायल वाटर की जगह गंदे पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है.
सिलेंडरों की कमी भी बना वजह
विषेशज्ञों का कहना है कि इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन ने बेशक मरीजों की जान बचाई, लेकिन इसके साथ मरीजों की नाक में पहुंचा प्रदूषण ब्लैक फंगस की वजह बना. कोरोना संक्रमण में मरीजों की जान बचाने के चक्कर में ऑक्सीजन एवं नाइट्रोजन सिलेंडरों को पूरी तरह साफ किए बिना ऑक्सीजन भरकर अस्पतालों में भेजनी पड़ी. सिलेंडरों की सफाई ठीक से न होना भी ब्लैक फंगस का कारण बन सकता है.
मेडिकल ऑक्सीजन इतने प्रतिशत तक होना चाहिए शुद्ध
बता दें कि इंडस्ट्री में प्रयोग किए जाने वाले सिलेंडरों की सफाई जरूरी नहीं होती, लेकिन इसे अस्पतालों में भेजने से पहले पूरी तरह कीटाणु रहित नहीं किया जा सका. पुराने एवं गोडाउन में रखे गए सिलेंडरों को तत्काल आक्सीजन आपूर्ति में इस्तेमाल किया गया. साथ ही इंडस्ट्रीयल ऑक्सीजन की शुद्धता 85-90 फीसद होती है, जिसकी आपूर्ति अस्पतालों में करनी पड़ी, जबकि मेडिकल ऑक्सीजन 95 फीसद से ज्यादा शुद्ध होनी चाहिए।
विषेशज्ञों का कहना है कि आक्सीजन आपूर्ति की पाइपलाइन व ह्यूमिडीफायर में फंगस जमा होने व कंटेनर में साधारण पानी का प्रयोग करने से भी बीमारी बढ़ी।










